Monday, April 8, 2013

CBSE Class 9/10 - Hindi - अपठित काव्यांश -३

अपठित काव्यांश -३ 

[CBSE class 10 Sample Paper]
निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रशनों के उत्तर लिखिए |

अरे चाटते जूठे पत्ते जिस दिन मैंने देखा नर को
उस दिन सोचा : क्यों न लगा दूँ आज आग इस दुनिया - भर को ?
यह भी सोचा : क्यों न टेंटुआ घोंटा जाये स्वयं जगपति का ?
credits:clker.com
जिसने अपने ही स्वरूप को दिया इस घृणित विकृति का |

जगपति कहाँ ? अरे, सदियों से वह तो हुआ राख की ढेरी
वरना समता संस्थापन में लग जाती क्या इतनी देरी ?
छोड़ आसरा अलख शक्ति का; रे नर, स्वयं जगपति तू है,
तू यदि जूठे पत्ते चाटे, तो मुझ पर लानत है, थू है |

ओ भिखमंगे, अरे पराजित, ओ मजलूम, अरे चिर दोहित,
तू अखंड भण्डार शक्ति का; जाग, अरे निद्रा-सम्मोहित,
प्राणों को तडपाने वाली हुंकारों से जल-थल भर दे,
अनाचार के अम्बारों में अपना ज्वलित पलीता धर दे |




प्र१: कवि ने ऐसा क्या देखा कि उसके मन में उथल - पुथल मच गई और फिर मन में क्या विचार आया?

प्र२: कवि को इश्वर से क्या शिकायत है ?

प्र३: कवि मनुष्य को किस प्रकार जागृत करने का प्रयास करता है?

प्र४: 'ढेर' और 'सहारा' के लिए प्रस्तुत पंक्तियों में कौन-कौन से शब्द आयें हैं ?




उत्तर:

उ१: कवि ने जब मनुष्य को जूठी पत्तल खाते देखा तो उसे क्रोध आ गया | एवं उसे जग विनाश का विचार आने लगा|

उ२: कवि को लगता है की ईश्वर का अस्तित्व समाप्त हो चुका है | ईश्वर ने अपनी पहचान खो दी है और वह अमीर गरीब का भेद मिटाने में असमर्थ हो गया है |

उ३: कवि मनुष्य को पराजित, भिखारी और मजबूर कह कर उसके आत्मसम्मान को झंझोड़ने की कोशिश करता है |

उ४: अम्बार, आसरा

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